पूरी औरत
उडेल दिया हुस्न सारा मीठी कविताओं में
कभी आँखें लिखी
कभी लब लिखे
कभी ज़ुल्फ़ें लिखी
तो कभी सुराही दार गर्दन लिखी
माथे की बिंदिया हो
या पैरों की पायल हो
कमरबंद हो या
बाज़ूबंद हो
हाथों का कंगना हो
कानों की बाली हो
बोलने के लहजे का
सिखाती जो तरीक़ा हो
समाज की बदलती नज़रों से
ख़ुद को बचाती इस क़दर हो
घर की बाग-डोर के साथ साथ
बच्चों में बढ़ाती जो संस्कार हो
हर एक बात लिखी पर
मीठी कविता लिखने के लिए औरत ज़ात लिखी
कई ग़ज़लों और नज़्मों के
सारे हर्फ़ और मिसरे लिखे
उस का हुस्न-ओ-जमाल लिखा
पर छोड़ दिए दुख सारे
भूल गए सभी यातनाएँ
जो सहा था उस ने रात और दिन
वो किसे जा कर कैसे सुनाए
लिखने वालो सुनो लिखना हो कुछ तो सब लिखना होगा
तल्ख़ के साथ मीठा लिखना होगा
ज़हर के साथ अमृत लिखना होगा
रक्षक के साथ भक्षक लिखना होगा
ज़ख़्म के साथ मरहम लिखना होगा
तेजी से बदलते इस दौर में
खाकर चोट जैसे वो सॅंभली थी
हुबहू वो तस्वीर लिखनी होगी
भूलना मत बुरी बातें भी
लिखते वक़्त पूरी औरत लिखना होगा















