रंग-ए-शराब से मिरी निय्यत बदल गई

वाइज़ की बात रह गई साक़ी की चल गई

तय्यार थे नमाज़ पे हम सुन के ज़िक्र-ए-हूर
जल्वा बुतों का देख के निय्यत बदल गई

मछली ने ढील पाई है लुक़्में पे शाद है
सय्याद मुतमइन है कि काँटा निगल गई

चमका तिरा जमाल जो महफ़िल में वक़्त-ए-शाम
परवाना बे-क़रार हुआ शम्अ'' जल गई

उक़्बा की बाज़-पुर्स का जाता रहा ख़याल
दुनिया की लज़्ज़तों में तबीअ'त बहल गई

हसरत बहुत तरक़्क़ी-ए-दुख़्तर की थी उन्हें
पर्दा जो उठ गया तो वो आख़िर निकल गई

— Akbar Allahabadi

More by Akbar Allahabadi

Other ghazal from the same pen

See all from Akbar Allahabadi →

Maikashi Shayari

Shers of maikashi.

All Maikashi Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling