hain sau tarah ke rang har ik naqsh-e-paa men dekh | हैं सौ तरह के रंग हर इक नक़्श-ए-पा में देख

  - Akbar Hyderabadi

हैं सौ तरह के रंग हर इक नक़्श-ए-पा में देख
इंसाँ का हुस्न आइना-ए-इर्तिक़ा में देख

यूँँ ही नहीं ये बरतरी-ए-नस्ल-ए-आदमी
गुज़रे हैं कैसे हादसे सई-ए-बक़ा में देख

सर्फ़-ए-नज़र हैं वक़्त की पिन्हाइयाँ तमाम
दुनिया-ए-ना-रसा मिरी फ़िक्र-ए-रसा में देख

ये रौशनी तो लौ है इसी इक चराग़ की
तज़ईन-ए-दहर ज़ेहन की नशो-ओ-नुमा में देख

इस कारोबार जान-ओ-जसद पर निगाह डाल
हैं कैसी कैसी ने'मतें आब-ओ-हवा में देख

याँ कितने लोग मर के अमर हो गए न पूछ
क्या सूरतें बक़ा की हैं राह-ए-फ़ना में देख

सुन तो ख़िराम-ए-वक़्त में हैं कैसी आहटें
क्या रंग पुर-फ़िशाँ हैं ग़ुबार-ए-हवा में देख

'अकबर' है एक महशर-ए-इल्म-ओ-ख़बर दिमाग़
शोर-ए-हयात ख़ाना-ए-बीम-ओ-रजा में देख

  - Akbar Hyderabadi

Diversity Shayari

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