तर्क-ए-वफ़ा की बात कहें क्या
दिल में हो तो लब तक आए
दिल बेचारा सीधा सादा
ख़ुद रूठे ख़ुद मान भी जाए
चलते रहिए मंज़िल मंज़िल
इस आँचल के साए साए
दूर नहीं था शहर-ए-तमन्ना
आप ही मेरे साथ न आए
आज का दिन भी याद रहेगा
आज वो मुझ को याद न आए
— Akhtar Nazmi
दिल में हो तो लब तक आए
दिल बेचारा सीधा सादा
ख़ुद रूठे ख़ुद मान भी जाए
चलते रहिए मंज़िल मंज़िल
इस आँचल के साए साए
दूर नहीं था शहर-ए-तमन्ना
आप ही मेरे साथ न आए
आज का दिन भी याद रहेगा
आज वो मुझ को याद न आए
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