likha hai mujh ko bhi likhna pada hai | लिखा है मुझ को भी लिखना पड़ा है

  - Akhtar Nazmi

लिखा है मुझ को भी लिखना पड़ा है
जहाँ से हाशिया छोड़ा गया है

अगर मानूस है तुम से परिंदा
तो फिर उड़ने को पर क्यूँँ तोलता है

कहीं कुछ है कहीं कुछ है कहीं कुछ
मिरा सामान सब बिखरा हुआ है

मैं जा बैठूँ किसी बरगद के नीचे
सुकूँ का बस यही एक रास्ता है

क़यामत देखिए मेरी नज़र से
सवा नेज़े पे सूरज आ गया है

शजर जाने कहाँ जा कर लगेगा
जिसे दरिया बहा कर ले गया है

अभी तो घर नहीं छोड़ा है मैं ने
ये किस का नाम तख़्ती पर लिखा है

बहुत रोका है इस को पत्थरों ने
मगर पानी को रास्ता मिल गया है

  - Akhtar Nazmi

Nigaah Shayari

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