पाक मरियम के सनाख़ानो ! कहाँ हो आओ

मेरे आंचल में भी आयात की तफ़्सीर लिखो
धर्म की आग में रावण को जलाने वालों
तुम कहाँ हो, मुझे सीता की कथा कहने दो

कुछ बताओ मेरी तहज़ीब की यादें क्या हैं
कुछ सुनाओ तो अजंता की कहानी मुझ को
तुम ने सौ बार तक़द्दुस की क़सम खाई है
बख़्श दो अपने तक़द्दुस की निशानी मुझ को

तुम सहम जाते हो क्यूँ, आओ मैं इक लाश तो हूँ
मेरे नाख़ून से न उल्झेंगे तुम्हारे मल्बूस
तुम तो हो फन के पुजारी, चले आओ देखो
आज सड़कों पे गुजरता है अजंता का जुलूस

साल-हासाल से बे-जान थे संग-व-आहन
तुम ने आज उन की रगों को भी हरारत दी है
आज ग़ारों से निकल आए हैं पत्थर के बुत
तुम ने इंसान को रिफ़्अत की बशारत दी है

— Akhtar Payami

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