जो पलकों पर मिरी ठहरा हुआ है

वो आँसू ख़ून में डूबा हुआ है

फ़रिश्ते ख़्वान ले कर आ रहे हैं
सहीफ़ा ताक़ में रक्खा हुआ है

कोई अनहोनी शायद हो गई फिर
ग़ुबार-ए-कारवाँ ठहरा हुआ है

किसी की ख़्वाहिशें पा-बस्ता कर के
ये कब सोचा हरम रुस्वा हुआ है

वो इक लम्हा जो तेरे वस्ल का था
बयाज़-ए-हिज्र पर लिक्खा हुआ है

मुझे भी हो गया इरफ़ान-ए-ज़ात अब
मुक़ाबिल आइना रक्खा हुआ है

अयादत करने सब आए हैं 'अख़्तर'
तिरा चेहरा मगर उतरा हुआ है

— Akhtar Shahjahanpuri

More by Akhtar Shahjahanpuri

Other ghazal from the same pen

See all from Akhtar Shahjahanpuri →

Emotional Shayari

Shers of emotional.

All Emotional Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling