तिरे ख़याल का नश्शा उतरता जाता है

ठहर ठहर के कोई पल गुज़रता जाता है

बिखरती है मिरे चेहरे पे जितनी पीलाहट
ऐ ज़िंदगी तिरा चेहरा निखरता जाता है

ज़मीं को भूक लगी फिर किसी तमद्दुन की
ये कौन ज़ीना-ए-इबरत उतरता जाता है

बता रही है थकन तेरे ज़र्द लहजे की
तिरे लहू में कोई ख़्वाब मरता जाता है

जिसे सजाना था अरमान उस की ज़ुल्फ़ों में
वो फूल उस की तलब में बिखरता जाता है

— Ali Arman

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