subh har ujaale pe raat ka gumaan kyun hai | सुब्ह हर उजाले पे रात का गुमाँ क्यूँँ है

  - Ali Sardar Jafri

सुब्ह हर उजाले पे रात का गुमाँ क्यूँँ है
जल रही है क्या धरती अर्श पे धुआँ क्यूँँ है

ख़ंजरों की साज़िश पर कब तलक ये ख़ामोशी
रूह क्यूँँ है यख़-बस्ता नग़्मा बे-ज़बाँ क्यूँँ है

रास्ता नहीं चलते सिर्फ़ ख़ाक उड़ाते हैं
कारवाँ से भी आगे गर्द-ए-कारवाँ क्यूँँ है

कुछ कमी नहीं लेकिन कोई कुछ तो बतलाओ 'इश्क़ इ
से सितमगर का शौक़ का ज़ियाँ क्यूँँ है

हम तो घर से निकले थे जीतने को दिल सब का
तेग़ हाथ में क्यूँँ है दोश पर कमाँ क्यूँँ है

ये है बज़्म-ए-मय-नोशी इ
से में सब बराबर हैं
फिर हिसाब-ए-साक़ी में सूद क्यूँँ ज़ियाँ क्यूँँ है

देन कि
से निगह की है किन लबों की बरकत है
तुम में 'जाफ़री' इतनी शोख़ी-ए-बयाँ क्यूँँ है

  - Ali Sardar Jafri

Raat Shayari

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