अच्छा हुआ कि टूट के चाहा नहीं तुम्हेंरोने की बात और है लगता नहीं तुम्हेंजो भी शिकायतें है मेरे मुँह पे बोल दोये भी सुना मुझे कि मैं सुनता नहीं तुम्हें— Amar