अब इसके सिवा कोई चारा नहीं
मुहब्बत करेंगे दुबारा नहीं
बहुत आया ग़ुस्सा था तुझपे मगर
मना शुक्र तुझको मैं मारा नहीं
हो जितनी भी मुझ
में सहनशीलता
तेरा रूठ जाना गवारा नहीं
इक अरसे तलक मैं रहा मुंतज़िर
तुम्हीं ने था मुझको पुकारा नहीं
ज़मीं छोड़ने पे था मजबूर मैं
है कौन अपनी माँ का दुलारा नहीं
नहीं टूट सकता करूँँ क्या सनम
कि अंबर हूँ यारा मैं तारा नहीं
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