फिरसे रिश्ता निभा सकते हो
चाहो गर तो मना सकते हो
अब तो इसकी आदत सी है
तुम भी छोड़ के जा सकते हो
ख़ाब कि जिस
में हम और तुम थे
सच कर के दिखला सकते हो
मैंने तुम सेे कब ये कहा था
तारे तोड़ के ला सकते हो
लफ्ज़ वही इज़हार-ए-वफ़ा का
फिर से क्या दोहरा सकते हो
'अंबर' तुम से कुछ नहीं होगा
बस बातें ही बना सकते हो
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