कि जैसे कोई मुसाफ़िर वतन में लौट आए
हुई जो शाम तो फिर से थकन में लौट आए
न आबशार न सहरा लगा सके क़ीमत
हम अपनी प्यास को ले कर दहन में लौट आए
सफ़र तवील बहुत था किसी की आँखों तक
तो उस के बाद हम अपने बदन में लौट आए
कभी गए थे हवाओं का सामना करने
सभी चराग़ उसी अंजुमन में लौट आए
किसी तरह तो फ़ज़ाओं की ख़ामुशी टूटे
तो फिर से शोर-ए-सलासिल चलन में लौट आए
'अमीर' इमाम बताओ ये माजरा क्या है
तुम्हारे शे'र उसी बाँकपन में लौट आए
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Ameer Imam
our suggestion based on Ameer Imam
As you were reading Kamar Shayari Shayari