नहीं मानी है कभी हार न काबू आए

हम ने चीरा है ज़मीं को ख़ला को छू आए

गाँव की सादगी नस नस में बसी है उस के
उस की ज़ुल्फ़ों से मुझे धान की ख़ुशबू आए

तू जिसे चाह ले पल भर में सुख़न-वर कर दे
तुझ को काग़ज़ पे उतर आने का जादू आए

ऐसा फ़ीचर भी कोई ऐड करे वट्सप में
चाह मिलने की हो डी पी से निकल तू आए

इस से बेहतर तुझे कुछ और नहीं दे सकता
मेरे बच्चे ये दुआ है तुझे उर्दू आए

— Amit Jha Rahi

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