ये अश्कों भरी दास्तान-ए-मुहब्बत
लगी है ये फिर क्यूँ लुभाने मुहब्बत
न रातों की चिंता न दिन का ठिकाना
लगी जिस्म-ओ-जाँ पे है छाने मुहब्बत
हैं हम वो अनाड़ी जो उल्फ़त में हारे
मुहब्बत का ये खेल जाने मुहब्बत
थी दिलकश कभी जो है अब दर्द-ए-सर वो
मेरा सर लगी है ये खाने मुहब्बत
मुहब्बत के सागर में मर ही न जाएँ
कि हम को लगी है डुबाने मुहब्बत
— Amit Gautam















