Amit Gautam

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@amitg.230

amit gautam shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in amit gautam's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
आमद से कौन कहता है आती नई ग़ज़ल
दिन रात मश्क़ जब करूँ होती मेरी ग़ज़ल

शाइर जो ख़ुद को झोंक दे दिन रात आग में
कुंदन सी तप के निकले है भाई तभी ग़ज़ल

बेटी कभी है माँ कभी है दिलरुबा कभी
कितने ही लाड़ प्यार से रक्खी गई ग़ज़ल

लोबान की महक भी हमें यार कम लगे
हर-सू को ऐसे देखिये महका चली ग़ज़ल

दुखती रगों पे हाथ वो रख कर कभी कभी
क्यूँ यार एक टीस उठाती रही ग़ज़ल
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Amit Gautam
बस्ती उजड़ गई कहाँ वो अब मकाँ रहे
इंसानियत जो समझे वो इंसां कहाँ रहे

वो एक सानेहा अभी भी याद रह गया
बाक़ी फ़साने के न कोई अब निशाँ रहे

फल फूलते हैं लोग यहाँ बेच नफ़रतें
नफ़रत में मेरी उल्फ़तों की इक दुकाँ रहे

शीरीं ज़बान बोलते हैं लोग सामने
दिल देखिए तो ज़हर ही उसमें निहाँ रहे

तन्हा से रास्तों में अगर साथ आप हों
मेरे लिए तो बस ये ही इक कारवाँ रहे

हम ढूँढते तुम्हें थे ज़मीं और आसमाँ
इतने बरस बताओ ज़रा तुम कहाँ रहे

कितना भी मैं सँवारूॅं मगर बात जान लो
तुम बिन तो ज़िंदगी के ये पल राएगाँ रहे
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Amit Gautam
रह गई ज़ीस्त फ़क़त हाथों को मलने के लिए
हो सर-ए-राह कोई साथ भी चलने के लिए

राह-ए-उल्फ़त में कोई हमको भी मिल जाए सनम
बात बे बात हर एक बात मचलने के लिए

हाथ पे हाथ धरे रहने से कुछ होता नहीं
कुछ मशक़्क़त करो हालात बदलने के लिए

टूट कर बेबसी के हाल से जो गुज़रे दिल
दीजिए वक़्त उसे थोड़ा सॅंभलने के लिए

आप उस्ताद हैं गिरगिट से है सीखी फ़ितरत
वक़्त भी लेते नहीं रंग बदलने के लिए
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Amit Gautam
जो भी चाहा था सभी उसके सिवा हो जाना
मेरी क़िस्मत का रहा मुझसे ख़फ़ा हो जाना

या ख़ुदा क्यों नहीं होते हैं अता ख़्वाब मेरे
और आसानी से दूजों के अता हो जाना

हमने जीने की कठिन राह चुनी थी वरना
कितना आसान था ग़ुर्बत में फ़ना हो जाना

एक हसरत जो मेरे दिल में रही दब के सदा
मेरे घर का पता तेरा भी पता हो जाना

यूँ तो शिद्दत से निभाया था वो रिश्ता हमने
पर मुसलसल ही रहा उसका ख़फ़ा हो जाना

बेवफ़ा का जो सनद हमको मिला बेवफ़ा से
यूँ लगा बिन किए ही जुर्म सज़ा हो जाना

उलझनों में हमें रक्खे जिऍं या मर जाएँ
तेरे हाथों का दिया ज़हर दवा हो जाना
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Amit Gautam
जाने ये इश्क़ सर पे मेरे क्यों सवार है
हस्ती ही कर गया जो मेरी तार तार है

अब किससे दास्ताँ ग़म-ए-दिल की बयाँ करें
अहले जहाँ में जब ना कोई ग़म ग़ुसार है

अपनी शिकस्त का ना मुझे क्यों यकीन हो
दुश्मन में जाके बैठ गया राज़ दार है

तूफ़ान सामने था तभी छोड़ तुम गए
हम सोचते रहे कि तुम्हें एतिबार है

हुस्न आप का है जान यूँ क़ातिल मिज़ाज सा
हर दूसरा ही आपका होता शिकार है

अब सर कटा दें इश्क़ में या बादशाह हों
ये जंग-ए-इश्क़ इस दफ़ा तो आर पार है
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Amit Gautam
आश्नाई कभी अपनी भी थी दो चार के साथ
महफ़िलों में जो बुलाते बड़े इसरार के साथ

हमने उनको है रखा दिल में सजाकर ऐसे
जैसे तस्वीर लगा दे कोई दीवार के साथ

शहर का एक ही अख़बार जो सच बोलता था
हाथ उसने भी मिलाया हुआ सरकार के साथ

और देता है तो दे दर्द-ए-मुहब्बत ज़ालिम
लुत्फ़ आता है मुझे जीने में आज़ार के साथ

कल तलक जिसको सिखाया था पकड़ना छूरी
मुझको ही काट रहा है वो बड़े प्यार के साथ

बाप की पगड़ी की भी शान तुझे है रखनी
इज़्ज़त-ए-नफ़्स जुड़ा है मियाँ दस्तार के साथ

पिछली सर्दी में थी शादी मेरी महबूबा की
फूल भी ले गया था मैं वहाँ उपहार के साथ

मुझको ये इल्म है वो अब भी है दुश्मन मेरा
फूल क्यों लाया है फिर यार वो तलवार के साथ

आपकी बज़्म में आना था तो यारो हमने
ये ग़ज़ल पेश की है ताज़े से अशआर के साथ
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Amit Gautam
हादसे जितने घटे हैं ज़िंदगी में
सारे के सारे लिखे हैं शाइरी में

रूह तक को जान लेंगे आप मेरी
झाँक कर देखें तो मेरी डाइरी में

आप से जब वास्ता ही कुछ नहीं है
आप फिर क्यूँ आए मेरी रुख़्सती में

हो गया बर्बाद जब से आशियाना
दर-ब-दर फिरता हूँ मैं आवारगी में

कुछ तवज्जो मुझको भी दे दीजिएगा
शेर अच्छे कह रहा हूँ शाइरी में
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Amit Gautam
ये ज़िंदगी की कहानी समझ सके ही नहीं
तुम्हारी बातों के मानी समझ सके ही नहीं

न है कोई गिला शिकवा जो ज़िंदगी तुझसे
है आँखें क्यूँ मेरी पानी समझ सके ही नहीं

मैं जग को क्या ही बताता ये हाल-ए-दिल अपना
जो मेरे यार ये जानी समझ सके ही नहीं

मुहब्बतों में था उसकी लुटाया सब ही मगर
बिछड़ के क्यूँ गई रानी समझ सके ही नहीं

तबाह कर के तो जंगल महल बनाया मगर
बरसता नभ से न पानी समझ सके ही नहीं

जो ज़ख़्म पर हैं छिड़कते नमक उन्हीं को फिर
है चोट क्यूँ ही दिखानी समझ सके ही नहीं

जो हम निभा ही नहीं सकते ऐसी बातों की
क़सम ही क्यूँ है वो खानी समझ सके ही नहीं
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Amit Gautam
चलो मिलकर मना लें हम यहाँ पर जश्न-ए-आज़ादी
हो हिंदू सिख या फिर मुस्लिम हो हर घर जश्न-ए-आज़ादी

लहू जिनका बहा इंग्लिश हुकूमत से लड़ाई में
उन्हीं को याद करने का है अवसर जश्न-ए-आज़ादी

जो बच्चे जश्न-ए-आज़ादी पे झंडे बेचते दिखते
मना पाते नहीं हैं वो ही अक्सर जश्न -ए-आज़ादी

खड़ा है तान कर सीना जो सरहद पर मेरा भाई
तभी तो हम मना पाते बिना डर जश्न-ए-आज़ादी
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Amit Gautam
इक़रार भी किया नहीं इनकार भी नहीं
ज़ालिम से आँखें होती हैं दो चार भी नहीं

समझे न क्यूँ तू नैन की बतियाँ भी मेरी जाँ
लड़की तू हाए इतनी समझदार भी नहीं

क्यूँ झूट को न झूट न सच को ही सच कहें
लगते हैं आप इतने तो लाचार भी नहीं

वो गाँव छोड़ शहर में व्यापार को गए
खेती बची नहीं हुआ व्यापार भी नहीं

हक़दार सोए तान के चादर तमाम उम्र
लूटे वही जो अस्ल में हक़दार भी नहीं

मंज़िल की चाह को लिए रिश्ते लगाऊँ दाँव
मंज़िल के ऐसे हम हैं तलबगार भी नहीं
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Amit Gautam
क़रीब तो हैं वो जिस्म से पर दिल उनके क्यूँ दूर हो गए हैं
जिन्हें सहेजा कई बरस से वो रिश्ते नासूर हो गए हैं

मैं बोलता हूँ सदा ही सच पर घने अंधेरे में खो गया हूँ
सफ़ेद सा झूट बोलकर भी मगर वो मशहूर हो गए हैं

भले ही चीख़ा किए सड़क पर मगर न कोई किवाड़ खोला
अजब हैं बस्ती के हाल देखो अजब ये दस्तूर हो गए हैं

तुम्हीं से बरकत तुम्हीं से रौनक तुम्हीं से ख़ुशियाँ थीं घर में माँ पर
तुम्हारे बिन अब हर एक दिन रात मेरे बे-नूर हो गए हैं

कहीं पे झूले कहीं पे करतब कहीं पे मेले में थे खिलौने
ये बस तसव्वुर में सोचने को ही हम तो मजबूर हो गए हैं
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Amit Gautam
धुआँ धुआँ है ये शहर फिर क्यूँ समझ किसी को न जाने आए
मकीं यहाँ के पड़े हैं हैराँ ख़ुदा ही रस्ता दिखाने आए

तमाम जश्नों के वक़्त दुनिया जो साथ रहती लगाए मजमा
दुखों में जब हम हैं तन्हा होते कोई न ढाॅंढस बँधाने आए

पुराने घर की पुरानी छत पर जहाँ पे गुज़रा था अपना बचपन
वहीं पे मीचे जो आँख बैठा तो याद दिन सब पुराने आए

जहाँ पे थी फसलें लहलहाती जहाँ पे धरती को पूजते थे
यक़ीन मानो उसी जगह पर हैं सैकड़ों कारख़ाने आए

पड़े थे फ़ुटपाथ पर जो सोए वो सारे बच्चे जवाँ हैं अब पर
रहे वो बर्बाद उनको कोई न वक़्त रहते जगाने आए
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Amit Gautam
कोई शिकवा नहीं है शिकायत नहीं
बात यानी कि है अब मुहब्बत नहीं

अब तो पानी भी सर से गुज़रने लगा
आप करते हो फिर क्यों बग़ावत नहीं

हुस्न पे ये अकड़ क्यों मेरी जान-ए-जाँ
आप इतनी भी तो ख़ूबसूरत नहीं

कर्ण सा दान करते हैं तो आप फिर
ज़िंदगी में भला क्यूँ हो बरकत नहीं

कितनी शिद्दत से करता हूँ मैं कर्म पर
मेरे ऊपर है होती इनायत नहीं

ख़ुद का भाई ही दुश्मन से जब जा मिले
घर रहे फिर तो अपना सलामत नहीं

पहले मिल बैठ सब ग़म सुनाते थे पर
अब रही यार वैसी तो फ़ुर्सत नहीं
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Amit Gautam
समाँ ग़ज़ब का है डल झील के किनारे पर
करा दे सैर तू माझी मुझे शिकारे पर

है चाँद एक मेरे आगे एक अम्बर पे
निसार क्यूँ न करूँ जाँ मैं इस नज़ारे पर

उड़ान की तो है ख़्वाहिश मगर करूँ क्या मैं
कतर दिए किसी ज़ालिम ने मेरे सारे पर

अब अम्न-ओ-चैन की बातें नहीं करे कोई
अवाम झूम रहे मज़हबी से नारे पर

महक उठी है ये बगिया है शबनमी रातें
कि कायनात भी निखरे तेरे इशारे पर
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Amit Gautam
जगमगाती रात दिल वीरान सा है
दर्द भीतर तक मेरे क्यूँ आ बसा है

इश्क़ की वहशत तो कब की छोड़ आए
मन में छाया अब भी क्यूँ उन्माद सा है

खा गई वो यार लड़की सारे आशिक़
मेरा बचना तो मियाँ अपवाद सा है

आँख टकराए उठे तूफ़ान दिल में
इश्क़ है कम-बख़्त या फिर हादसा है

चार रोटी एक छत और चंद कपड़े
यार मेरी बस ये ही तो लालसा है

जैसे ख़ालिस आब-ए-कौसर उस जहाँ में
इश्क़ अपना इस जहाँ में पाक सा है
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Amit Gautam
क़ैस भी अब ये काम करता है
झुक के हमको सलाम करता है

आशिक़ी में जो फ़ेल हो जाए
शाइरी सुब्ह शाम करता है

अब जो माहौल है चुनावी सा
हर कोई राम राम करता है

पाप का जब घड़ा भरे तो फिर
चार के चार धाम करता है

मेरा महबूब है या है दुश्मन
मेरा जीना हराम करता है
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Amit Gautam
वक़्त ने ज़ख़्म तो भर दिया है मगर
अध मरा सा मुझे कर दिया है मगर

छोड़ कर तो गए इश्क़ का तुम सफ़र
बोझ सा सर मेरे धर दिया है मगर

बस गए हैं नगर काट जंगल सभी
जानवर को भी क्या घर दिया है मगर

लाख रहजन मिले हैं डगर में तो क्या
राह में एक रहबर दिया है मगर

बिन किसी आस के कर्म मैंने किए
उसने झोली में सब भर दिया है मगर
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Amit Gautam
ख़्वाब में जो आई थी वो हूर होगी
हुस्न के अपने नशे में चूर होगी

जो तवायफ़ बन के हम बिस्तर हो सबसे
सोचिए वो किस क़दर मजबूर होगी

चाहने वाला ही जब बन जाए दुश्मन
दुश्मनी तो उससे फिर भरपूर होगी

जो उठी दीवार अपने दरमियाँ वो
मौत पर भी अब न शायद दूर होगी

खोल कर दिल रख दिया मिसरों में और वो
पूछते हैं क्या ग़ज़ल मशहूर होगी
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Amit Gautam
पाई पाई को कमाने में पसीना आ गया
ज़िंदगी की दोपहर में मुझको जीना आ गया

ऐश में ही कट रही थी यूँ तो अपनी ज़िंदगी
पर भँवर में याद काशी और मदीना आ गया

कश्मकश के जब समंदर में लगे हम डूबने
एक उम्मीदों भरा देखो सफ़ीना आ गया

बेवफ़ाई का हुआ जब ज़िक्र अहल-ए-बज़्म में
आपके माथे पे काहे को पसीना आ गया

जब लगा मंज़िल हमारे है बहुत नज़दीक सी
तब अचानक सामने फिर एक ज़ीना आ गया
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Amit Gautam
आलम ए रुस्वाई है और कुछ नहीं है
रह गई तन्हाई है और कुछ नहीं है

जो मुसलसल साथ मेरा दे रही है
बस मेरी परछाई है और कुछ नहीं है

तुम पहाड़ों सा उसे हो क्यूँ बनाते
बात जो इक राई है और कुछ नहीं है

आपकी गुस्ताख़ियों पे चुप खड़े हैं
ये मेरी अच्छाई है और कुछ नहीं है

आए ख़ाली हाथ थे जाना है ख़ाली
इक ये ही सच्चाई है और कुछ नहीं है
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Amit Gautam

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