Diwali Shayari
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Diwali Shayari

तारीकियों को आग लगे और दिया जले
ये रात बैन करती रहे और दिया जले

उस की ज़बाँ में इतना असर है कि निस्फ़ शब
वो रौशनी की बात करे और दिया जले
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Tehzeeb Hafi
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शाम से छत पर घुम रहा हूँ
एक दिए के आगे-पीछे
Shariq Kaifi
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मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी
अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं
Unknown
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आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं
आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूँ
Azm Shakri
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जो बुजुर्गों की दुआओं के दीयों से रौशन
रोज़ उस घर में दीवाली का जश्न होता है
Pratap Somvanshi
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मेहनत तो करता हूँ फिर भी घर खाली है बाबूजी
मिट्टी के कुछ दीपक ले लो दीवाली है बाबूजी

मिट्टी बेच रहा हूँ जिसमें कोई जाल फ़रेब नहीं
सोना चाँदी दूध मिठाई सब जा'ली है बाबूजी
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Gyan Prakash Akul
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था इंतिज़ार मनाएँगे मिल के दीवाली
न तुम ही लौट के आए न वक़्त-ए-शाम हुआ
Aanis Moin
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वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअल्लुक़ था
दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से
Kaif Bhopali
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राहों में जान घर में चराग़ों से शान है
दीपावली से आज ज़मीन आसमान है
Obaid Azam Azmi
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हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का
हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
Nazeer Akbarabadi
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हमारे लोग अगर रास्ता न पाएँगे
शिलाएँ जोड़ के पानी पे पुल बनाएँगे

फिर एक बार मनेगी अवध में दीवाली
फिर एक बार सभी रौशनी में आएँगे
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Amit Jha Rahi
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जलते हैं इक चराग़ की लौ से कई चराग़
दुनिया तिरे ख़याल से रौशन हुई तो है
Shahzad Ahmad
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हर गीत में हर बार गाऊँगा तुझे
अपनी ग़ज़ल में गुनगुनाऊँगा तुझे

तू ईद है और तू ही दीवाली मेरी
मैं हर बरस यूँही मनाऊँगा तुझे
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Krishnakant Kabk
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मैं चाहता हूँ इक मुसलमां दोस्त हो मेरा
मेरे मकाँ में ईद हो उसके दिवाली हो
Siddharth Saaz
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"दिवाली"
मिरी सांसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है
ये दिवाली है सब को जीने का अंदाज़ देती है
हृदय के द्वार पर रह रह के देता है कोई दस्तक
बराबर ज़िंदगी आवाज़ पर आवाज़ देती है

सिमटता है अंधेरा पांव फैलाती है दिवाली
हंसाए जाती है रजनी हँसे जाती है दिवाली

क़तारें देखता हूँ चलते-फिरते माह-पारों की
घटाएँ आँचलों की और बरखा है सितारों की
वो काले काले गेसू सुर्ख़ होंट और फूल से आरिज़
नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की

निगाहों का मुक़द्दर आ के चमकाती है दिवाली
पहन कर दीप-माला नाज़ फ़रमाती है दिवाली

उजाले का ज़माना है उजाले की जवानी है
ये हँसती जगमगाती रात सब रातों की रानी है
वही दुनिया है लेकिन हुस्न देखो आज दुनिया का
है जब तक रात बाक़ी कह नहीं सकते कि फ़ानी है

वो जीवन आज की रात आ के बरसाती है दिवाली
पसीना मौत के माथे पे छलकाती है दिवाली

सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या
उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या
गगन की जगमगाहट पड़ गई है आज मद्धम क्यूँ
मुंडेरों और छज्जों पर उतर आए हैं तारे क्या

हज़ारों साल गुज़रे फिर भी जब आती है दिवाली
महल हो चाहे कुटिया सब पे छा जाती है दिवाली

इसी दिन द्रौपदी ने कृष्ण को भाई बनाया था
वचन के देने वाले ने वचन अपना निभाया था
जनम दिन लक्ष्मी का है भला इस दिन का क्या कहना
यही वो दिन है जिस ने राम को राजा बनाया था

कई इतिहास को एक साथ दोहराती है दिवाली
मोहब्बत पर विजय के फूल बरसाती है दिवाली

गले में हार फूलों का चरण में दीप-मालाएँ
मुकुट सर पर है मुख पर ज़िंदगी की रूप-रेखाएँ
लिए हैं कर में मंगल-घट न क्यूँ घट घट पे छा जाएँ
अगर परतव पड़े मुर्दा-दिलों पर वो भी जी जाएँ

अजब अंदाज़ से रह रह के मस़्काती है दिवाली
मोहब्बत की लहर नस नस में दौड़ाती है दिवाली

तुम्हारा हूँ तुम अपनी बात मुझ से क्यूँ छुपाते हो
मुझे मालूम है जिस के लिए चक्कर लगाते हो
बनारस के हो तुम को चाहिए त्यौहार घर करना
बुतों को छोड़ कर तुम क्यूँ इलाहाबाद जाते हो

न जाओ ऐसे में बाहर 'नज़ीर' आती है दिवाली
ये काशी है यहीं तो रंग दिखलाती है दिवाली
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Nazeer Banarasi
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