पाई पाई को कमाने में पसीना आ गया
ज़िंदगी की दोपहर में मुझ को जीना आ गया
ज़िंदगी की दोपहर में मुझ को जीना आ गया
ऐश में ही कट रही थी यूँ तो अपनी ज़िंदगी
पर भँवर में याद काशी और मदीना आ गया
कश्मकश के जब समुंदर में लगे हम डूबने
एक उम्मीदों भरा देखो सफ़ीना आ गया
बे-वफ़ाई का हुआ जब ज़िक्र अहल-ए-बज़्म में
आप के माथे पे काहे को पसीना आ गया
जब लगा मंज़िल हमारे है बहुत नज़दीक सी
तब अचानक सामने फिर एक ज़ीना आ गया
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जो मुसलसल साथ मेरा दे रही है
बस मेरी परछाई है और कुछ नहीं है
तुम पहाड़ों सा उसे हो क्यूँ बनाते
बात जो इक राई है और कुछ नहीं है
आप की गुस्ताख़ियों पे चुप खड़े हैं
ये मेरी अच्छाई है और कुछ नहीं है
आए ख़ाली हाथ थे जाना है ख़ाली
इक ये ही सच्चाई है और कुछ नहीं है
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न रातों की चिंता न दिन का ठिकाना
लगी जिस्म-ओ-जाँ पे है छाने मुहब्बत
हैं हम वो अनाड़ी जो उल्फ़त में हारे
मुहब्बत का ये खेल जाने मुहब्बत
थी दिलकश कभी जो है अब दर्द-ए-सर वो
मेरा सर लगी है ये खाने मुहब्बत
मुहब्बत के सागर में मर ही न जाएँ
कि हम को लगी है डुबाने मुहब्बत
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अक़्ल पर पत्थर पड़े हैं
भाई भाई से लड़े हैं
भाई भाई से लड़े हैं
पेड़ जो नफ़रत के हैं वो
मुँह उठाए क्यूँ खड़े हैं
लाशें ही लाशें बिछीं पर
आक़ा लड़ने पर अड़े हैं
ख़ुद की रोटी बाँट दें जो
दिल के तो वो ही बड़े हैं
चोर भी कलयुग में अब तो
तान कर सीना खड़े हैं
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बन गए नासूर मेरे दिल के छाले
पर मुझे मंज़ूर मेरे दिल के छाले
पर मुझे मंज़ूर मेरे दिल के छाले
आह पर हर शख़्स मेरी वाह करता
लुत्फ़ हैं भरपूर मेरे दिल के छाले
तालियों की गूंज में हर दर्द छुपता
बज़्म में मशहूर मेरे दिल के छाले
वस्ल के दिन बन गए है हिज्र में दाग़
हाए रे मजबूर मेरे दिल के छाले
जो छुड़ा के हाथ मेरा हो गई ग़ैर
उस का है सिंदूर मेरे दिल के छाले
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तुझ से मिलने की आस रहती है
और हमेशा ये प्यास रहती है
और हमेशा ये प्यास रहती है
ढूँढ़ने से भी वो नहीं मिलती
जो मेरे आस पास रहती है
मेरी दुल्हन बनेगी तू इक दिन
लड़की फिर क्यूँ उदास रहती है
उस को आवाज़ दो तो आएगा
दिल को इस की कयास रहती है
हार कर थक गया हूँ मैं लेकिन
जीत की अब भी आस रहती है
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तुम बतलाओ भाती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
दिल को भी छू जाती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
दिल को भी छू जाती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
जब रातों को सोती हो तुम आँखें मीचे
ख़्वाबों में भी आती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
पहले जैसे मुस्काती थी ग़ज़लें सुन कर
दिल अब भी धड़काती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
अब तो कोसों दूरी हम में रहती है पर
तुम को मुझ तक लाती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
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ज़िंदगी हम को भारी लगती है
हर किसी से ये हारी लगती है
हर किसी से ये हारी लगती है
जी लिए हम जहाँ में अपने पल
मौत से अब तो यारी लगती है
ज़िंदगी महफ़िलों में गुज़री पर
तन्हा हम ने गुज़ारी लगती है
चोट पर चोट दे गई वो तो
वो हमें फिर भी प्यारी लगती है
लाख कोशिश पे जो न उतरे वो
ये अजब सी ख़ुमारी लगती है
ख़त्म कर दी जो लिखके काग़ज़ पे
वो कहानी तो जारी लगती है
साफ-गोई से उस ने ठुकराया
हम को फिर क्यूँ हमारी लगती है
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दबे होंठ से मुस्कुराती है अब भी
वो लड़की ख़यालों में आती है अब भी
वो लड़की ख़यालों में आती है अब भी
है मालूम हम को नहीं अब हमारी
क़सम पर ख़ुदा की वो खाती है अब भी
शजर के कबूतर को पकड़े शिकारी
ये दादी कहानी सुनाती है अब भी
सयाना है बेटा हुई माँ भी बूढ़ी
मगर वो दुखों को छुपाती है अब भी
कमाया है पैसा कमाई है शोहरत
मगर ज़िंदगी तो रुलाती है अब भी
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बैठे बैठे उफ़ ये आफ़त हो गई
एक दिन हम को मुहब्बत हो गई
एक दिन हम को मुहब्बत हो गई
हम समझते थे जिसे आफ़त तमाम
अब हमें उस की ही आदत हो गई
सुब्ह की पहली किरण के साथ में
देखने की उन को हसरत हो गई
अब चलो इतनी तो राहत हो गई
चूमने की अब इजाज़त हो गई
देखते ही देखते हम लुट गए
हम को भारी ये शराफ़त हो गई
जो इमारत ढह गई थी इश्क़ की
उस इमारत की मरम्मत हो गई
मय लगाकर होंठ से वो बोलते
अब हमारी तो इबादत हो गई
रात भर पलकें उठीं पलकें गिरीं
आँखों आँखों में शरारत हो गई
हम क़यामत पर न उन से मिल सके
हाए ये कैसी क़यामत हो गई
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