दबे होंठ से मुस्कुराती है अब भी
वो लड़की ख़यालों में आती है अब भी
है मालूम हम को नहीं अब हमारी
क़सम पर ख़ुदा की वो खाती है अब भी
शजर के कबूतर को पकड़े शिकारी
ये दादी कहानी सुनाती है अब भी
सयाना है बेटा हुई माँ भी बूढ़ी
मगर वो दुखों को छुपाती है अब भी
कमाया है पैसा कमाई है शोहरत
मगर ज़िंदगी तो रुलाती है अब भी
— Amit Gautam















