mujh se banta hua tu tujh ko banata hua main | मुझ से बनता हुआ तू तुझ को बनाता हुआ मैं

  - Ammar Iqbal

मुझ से बनता हुआ तू तुझ को बनाता हुआ मैं
गीत होता हुआ तू गीत सुनाता हुआ मैं

एक कूज़े के तसव्वुर से जुड़े हम दोनों
नक़्श देता हुआ तू चाक घुमाता हुआ मैं

तुम बनाओ किसी तस्वीर में कोई रस्ता
मैं बनाता हूँ कहीं दूर से आता हुआ मैं

एक तस्वीर की तकमील के हम दो पहलू
रंग भरता हुआ तू रंग बनाता हुआ मैं

मुझ को ले जाए कहीं दूर बहाती हुई तू
तुझ को ले जाऊँ कहीं दूर उड़ाता हुआ मैं

इक इबारत है जो तहरीर नहीं हो पाई
मुझ को लिखता हुआ तू तुझ को मिटाता हुआ मैं

मेरे सीने में कहीं ख़ुद को छुपाता हुआ तू
तेरे सीने से तिरा दर्द चुराता हुआ मैं

काँच का हो के मिरे आगे बिखरता हुआ तू
किर्चियों को तिरी पलकों से उठाता हुआ मैं

  - Ammar Iqbal

Tasweer Shayari

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