nazar khamosh hui arz-e-na-tamaam ke ba'ad | नज़र ख़मोश हुई अर्ज़-ए-ना-तमाम के बा'द

  - Anand Narayan Mulla

नज़र ख़मोश हुई अर्ज़-ए-ना-तमाम के बा'द
कुछ और कह न सके अश्क-ए-बे-कलाम के बा'द

ये मुग़बचे तिरे साक़ी अभी हैं ख़ीरा बहुत
हर एक जाम-ए-तही और सला-ए-आम के बा'द

बस इतनी बात के क्या क्या हैं बज़्म में चर्चे
वो मुस्कुरा से दिए थे मिरे सलाम के बा'द

नमाज़-ए-जाम पढ़ी शैख़ ने नहीं लेकिन
'अजब सा नूर है रुख़ पर तुलू-ए-शाम के बा'द

हर इक नज़ाअ' का हल इंतिक़ाम ही है अभी
मगर सवाल तो ये है कि इंतिक़ाम के बा'द

ये लग रहा है कि जैसे बिछड़ रही है हयात
पलट पलट के निगाहें हैं गाम गाम के बा'द

किसी महल किसी वादी किसी चमन में नहीं
वो गुल जो दिल में महकता है नेक काम के बा'द

ग़ुरूर-ए-तिश्ना-लबी भी है कोई शय साक़ी
तक़ाज़ा हम नहीं करने के जाम जाम के बा'द

ये सच नहीं कि मिरे दिल में और नाम नहीं
मगर ये सच है कि ये सब हैं तेरे नाम के बा'द

है ज़ीस्त ज़ीस्त उसी की कि जिस के बाज़ू को
उरूस-ए-सुब्ह भी ढूँडे निगार-ए-शाम के बा'द

बदलती क़द्रों में कुछ हूँ कि कुछ नहीं 'मुल्ला'
सवालिया सा निशाँ हूँ ख़ुद अपने नाम के बा'द

  - Anand Narayan Mulla

Dil Shayari

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