बातों में बचपन का जब किस्सा आया
पत्थर जैसे दिल को भी रोना आया
पहली बार जो उसकी आँखों में देखा
उसको ढूंढा और मुझे भटका आया
खूब थे पैसे जब गिनना नइ आता था
कम ही लगते है जबसे गिनना आया
घूम घूम कर दुनिया देखी जिसने भी
हार गया तो अपने घर सीधा आया
सारी 'उम्र करी जिस चेहरे से नफ़रत
मरते मरते याद वही चेहरा आया
रोते रोते साल गुज़ारे जो हमनें
बाद में उनपर हमको ही हँसना आया
पहले हम बस मरते मरते जीते थे
मरना सीखा तब जाकर जीना आया
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