पता मुझ को है पहले से उसे इंकार करना है
तसल्ली के लिए मुझ को मगर इज़हार करना है
कोई तावीज़ मिल जाए कि ये इच्छा करे पूरी
बहुत वो दूर है लेकिन मुझे दीदार करना है
इरादा क्या है मेरी जाँ बहुत नज़दीक बैठी हो
क़त्ल करना है या हम दो को दो से चार करना है
नज़र उन से ये संडे को बाग़ीचे में मिली ऐसी
कि अब हफ़्ते के हर दिन को मुझे इतवार करना है
सितम करने को बैठी है मगर कोई उसे कह दो
अभी कच्चा है दिल इस को ज़रा तय्यार करना है
मिरी कश्ती को लहरें तोड़ बैठी हैं तो अब मुझ को
किनारे पर खड़े हो कर समुंदर पार करना है
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Anand Verma
our suggestion based on Anand Verma
As you were reading Greed Shayari Shayari