अगर इंसां की फ़ितरत हम बदलते

मुहब्बत बाँटते, आलम बदलते

बदलना कुछ हमारे बस में होता
तो सब से पहले तेरे ग़म बदलते

हम अपने सारे लम्हें क़ैद करते
हर इक सप्ताह इक अल्बम बदलते

हकीम अपना बदलते फिर रहे हो
असर पड़ता अगर मरहम बदलते

बदलते हम अगर पड़ती ज़रूरत
मगर औरों से थोड़ा कम बदलते

बदलते तुम हो हर मौसम मुताबिक
बदलते हम तो ख़ुद मौसम बदलते

— Anand Verma

More by Anand Verma

Other ghazal from the same pen

See all from Anand Verma →

Mohabbat Shayari Collection

Shers of mohabbat shayari collection.

All Mohabbat Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling