अगर इंसां की फ़ितरत हम बदलते
मुहब्बत बाँटते, आलम बदलते
बदलना कुछ हमारे बस में होता
तो सब सेे पहले तेरे ग़म बदलते
हम अपने सारे लम्हें कैद करते
हर इक सप्ताह इक अल्बम बदलते
हकीम अपना बदलते फिर रहे हो
असर पड़ता अगर मरहम बदलते
बदलते हम अगर पड़ती ज़रूरत
मगर औरों से थोड़ा कम बदलते
बदलते तुम हो हर मौसम मुताबिक
बदलते हम तो ख़ुद मौसम बदलते
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