कोई शिकवा न शिकायत न गिला करते हैं
हम तो मुद्दत हुई ख़ामोश रहा करते हैं
हम को आता है ज़माने से निपटना लेकिन
हम बड़े ज़ब्त से होंठों को सिया करते हैं
ऐन मुमकिन है सुनी जाए हमारी इस बार
आइए हाथ उठाते हैं दुआ करते हैं
उन से कह दो कि वो अब बाम पे आया न करें
कितने लोगों को वो बर्बाद किया करते हैं
हम तो बरसों से कहीं भी नहीं आते-जाते
बे-इरादा तिरी गलियों में फिरा करते हैं
कैसा बस्ती पे मेरी अब के अज़ाब आया है
दिन दहाड़े यहाँ तूफ़ान उठा करते हैं
अपने हुज़रे में पड़ा रहता है चुप-चाप 'अंचल'
लोग आवाज़ पे आवाज़ दिया करते हैं
— Anchal Maurya















