थपेड़े वक़्त के बे-शक वो हँस-कर सह भी सकता था
मगर कुछ पल में ही दीवार तन्हा ढह भी सकता था
यक़ीनन कश्मकश होगी अजी कुछ सिलसिले होंगे
ये मेरी आँख का आँसू तो बाहर बह भी सकता था
तुम्हें ही चाहता हूँ मैं तुम्हें ही चाहता है दिल
रहा ख़ामोश मैं जब कि तुम्हें ये कह भी सकता था
ये उस का फ़ैसला था रास्ते को छोड़ देते हैं
उसी रस्ते पे लेकिन मैं सहर तक रह भी सकता था
— Ankit Dixit















