तूफ़ाँ में फँस गया कोई चारा नहीं मिला
कश्ती अगर मिली तो किनारा नहीं मिला
उस ने उठा के हाथ बुलाया तो था मगर
मैं ढूँढ़ने गया तो बिचारा नहीं मिला
लाखों ग़मों की हम पे तो संदूक़ खुल पड़ी
क़िस्मत जो खोल दे वो पिटारा नहीं मिला
हम क्या करें किसी से हक़ीक़त की बात जब
ख़्वाबों में भी जिसे था पुकारा नहीं मिला
हम को तो उस गुनाह की भी मिल गई सज़ा
जिस
में कोई क़ुसूर हमारा नहीं मिला
हिम्मत को बाँध ख़ुद ही वो आगे निकल पड़ा
जब अर्ज़ को कोई भी सहारा नहीं मिला
— Ankit Dixit















