दीवारों पर ग़म के साए चलते हैं
तुझ को पाकर भी खो आए चलते हैं
पास तुम्हारे अब लाखों का मज्मा है
अच्छा हम भी हुए पराए चलते हैं
जिन राहों पर आँखें मूँदे चलती तुम
उन राहों पर हम टकराए चलते हैं
आज जवानी ठोकर खाकर गिरती है
बूढ़े कंधे बोझ उठाए चलते हैं
जोगी वाला अलबेला'पन है मुझ
में
सब पर इक संसार लुटाए चलते हैं
— Anmol Mishra















