"प्रिय अँधेरा"
तेज़ आती रौशनी में
आँख की पुतली की सिकुड़न
झूठ
सच क्या
लग रही मुझ को वो सिहरन
रौशनी से डर गई क्यूँ
आज पुतली आँख की
पूछने पर
काँपते होंठों से बोली
प्रिय अँधेरा
कोई भी बंदिश न रक्खे
खोल दे बेड़ी उजाले की लगाई
प्यास से जब कंठ सूखे
आँसुओ को ये पुकारे
और दिन भर रौशनी की
आँख पलकें मुफ़्त में करती बेगारी
पर उन्हें लोरी सुनाकर
पीठ उन की थप थपाकर
ख़्वाब मीठे से दिखा कर
नींद की चादर बिछाकर
उस के ऊपर फिर सुलाकर
जागता ख़ुद फिर अँधेरा
प्रिय अँधेरा
— Anmol Mishra















