"उजड़ते बसते घर"

बहुत तूफ़ान हैं मेरी जान,
न घर बना इस ख़ुश्क साहिल पे
सुनो! ये घर नहीं बस रेत का छोटा घरौंदा है,
न जाने कितने तूफ़ानों ने कितनी बार रौंदा है
बहुत टूटा है और फिर टूट कर बनता बिगड़ता है,
ये मेरी हसरतों को चैन देकर फिर उजड़ता है
उजड़कर चल पड़ा ये फिर किसी उजड़े से साहिल पे
तो क्या? तूफ़ान हैं मेरी जान
पर! तू घर बना इसी ख़ुश्क साहिल पे

— Anmol Mishra

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