हज़ारों बार भरा था अभी भी ख़ाली है
ये हसरतों का कसोरा अभी भी ख़ाली है
कभी तो देख तू दस्त-ए-तलब की महरूमी
तेरी तरफ़ जो बढ़ा था अभी भी ख़ाली है
ज़माने भर के ग़मों ने यहाँ क़याम किया
ये क्या ग़ज़ब है के सीना अभी भी ख़ाली है
फिर आज क़ब्र से लैला की ये सदा आई
कहाँ है क़ैस कि सहरा अभी भी ख़ाली है
जिसे गुमाँ था के भर देगा रौशनी से जहाँ
उस आफ़ताब को कहना अभी भी ख़ाली है
इक आरज़ू की तड़प कर जहाँ पे मौत हुई
हमारे दिल का वो हुजरा अभी भी ख़ाली है
जो अपने पीर के क़दमों से उठ गया "ग़ाफ़िल"
भटक रहा है अभागा अभी भी ख़ाली है
— Ansh Ghafil















