मेरे मिटने के सबब इक मोजिज़ा होने को है
एक पत्थर उस से छू कर देवता होने को है
मेरी वहशत इतनी ज़्यादा बढ़ गई मैं क्या कहूँ
जो मेरी सिसकी थी अब वो कहकहा होने को है
इस क़दर फ़ितरत में तब्दीली हुई है इश्क़ से
जो शिकायत थी लबों पर वो दुआ होने को है
ख़त्म होती जा रही है ज़िन्दगी की आरज़ू
एक वो ही था मेरा वो भी जुदा होने को है
रेगज़ारों तुम ने मेरी प्यास को सजदा किया
क्या किसी दरिया से मेरा सामना होने को है
उन की चौखट पर मुझे ये इश्क़ ले कर आ गया
देखते हैं इस के आगे और क्या होने को है
दीन-ओ-दुनिया भूल कर हम इस क़दर ग़ाफ़िल हुए
कितने ही अफ़्सानों की अब इब्तिदा होने को है















