मुझे इस वक़्त ये साया हुआ है

कोई दहलीज़ पे आया हुआ है

ये बातें ऐन मुमकिन हैं वगरना
इन्हें हम ने भी ठुकराया हुआ है

तमाशों की नुमाइश देख लो तुम
तुम्हें हम ने ही बुलवाया हुआ है

वो आया है मगर खोया है, गुम है
नहीं लगता है के आया हुआ है

हरी डाली पे उस तितली का दुख है
कहीं इक फूल मुर्झाया हुआ है

तजुर्बा है बड़े पेड़ों में लेकिन
उन्हें रस्मों ने उलझाया हुआ है

मशक्कत क्यूँ करें हम मुस्कराकर
हमें अश्कों ने बहलाया हुआ है

दिनों दिन फूलता फलता है क्योंकि
ये ग़म जागीर में पाया हुआ है

— Anshika Shukla

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