होंठ खोले हुए खिलखिलाए हुए
एक अर्सा हुआ मुस्कुराए हुए
ऐसे ख़्वाबों की ता'बीर मुमकिन नहीं
संग तेरे जो लम्हे बिताए हुए
मुझ से रूठा मुक़द्दर भी तेरी तरह
मुँह घुमाए हुए सिर झुकाए हुए
आइनों से निकाले हुए अक्स हैं
एक तस्वीर में हम छुपाए हुए
आ गए हम अँधेरों में इक रोज़ फिर
इक दिए को सहारा बनाए हुए
— anupam shah















