वही है आदमी तक़दीर वाला
जिसे दो वक़्त का हासिल निवाला
तेरी क़ुरबत में खाए हैं यूँ धोखे
कि जैसे आसतीं में साँप पाला
हमारी राह में ही आ गिरा फिर
वही पत्थर जो तबीअत से उछाला
मुहब्बत बा'द मेरे तुम ने जो की
मेरा ग़ुस्सा रक़ीबों पर निकाला
— anupam shah
जिसे दो वक़्त का हासिल निवाला
तेरी क़ुरबत में खाए हैं यूँ धोखे
कि जैसे आसतीं में साँप पाला
हमारी राह में ही आ गिरा फिर
वही पत्थर जो तबीअत से उछाला
मुहब्बत बा'द मेरे तुम ने जो की
मेरा ग़ुस्सा रक़ीबों पर निकाला
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