चांदनी में रात भर सारा जहांअच्छा लगा

धूप जब फैली तो अपना ही मकांअच्छा लगा

अब तो ये एहसास भी बाक़ी नहीं है दोस्तों
किस जगह हम मुज़महिल थे और कहांअच्छा लगा

आके अब ठहरे हुए पानी से दिलचस्पी हुई
एक मुद्दत तक हमें आबे रवांअच्छा लगा

लुट गए जब रास्ते में जाके तब आँखें खुली
पहले तो एख़लाक़-ए-मीर कारवांअच्छा लगा

जब हक़ीक़त सामने आई तो हैरत में पड़े
मुद्दतों हम को भी हुस्ने दास्तांअच्छा लगा

— Anwar Jalalpuri

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Raasta Shayari

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