डरते रहे कि गर्द-ए-सफ़र में फ़ना न हो
हर गाम पर है ख़ौफ़ कि ख़ुद से ख़ता न हो
दिलबर वो चाहिए मुझे राह-ए-हयात में
जो इश्क़ की मिसाल हो पर बद-बला न हो
शब इस क़दर उदास है कटने लगी है यूँ
जो नींद आ भी जाए तो ग़म से रिहा न हो
माज़ी की धूप साथ लिए ग़म की बारिशें
इन सब के दरमियान कहीं रतजगा न हो
मौक़ा दिया है वक़्त ने इक गाम चल सकूँ
डर है कि इस सफ़र में कोई वाक़िआ' न हो
जज़्बात टूटते हैं तो चेहरे पे दिखते हैं
मुझ को ये फ़िक्र है कि कहीं ज़ाहिरा न हो
चाहत सभी की छोड़ दी मैं ने ये सोच कर
अब ज़िंदगी में ग़म से कभी सामना न हो
— arjun chamoli















