हर गाम चाहतों में गिरह है ख़याल पर
क्यूँ जी रहे हैं ख़्वाब-ए-हवस की मिसाल पर
ज़ेहनों में बुन रहे हैं ख़यालात का गुमाँ
सच बोलते नहीं कोई सच के सवाल पर
आ कर वुजूद बेच दिया इक मक़ाम पर
अब ढूँढ़ते हैं अज़्म-ए-ख़ुदी को मआल पर
ज़ंजीर-ए-आरज़ू को ही बस ज़ीस्त मान कर
आज़ादियाँ भुला के पड़े किस बवाल पर
क़ब्रों पे ताज रखते हैं दुनिया में लोग अब
पर साथ-साथ आँख है मुर्दे के माल पर
दौलत की गर्द देख के रिश्ते बने तो क्या
तन्हा ही लौटते हैं सभी इंतिक़ाल पर
— arjun chamoli















