सब्र का फल अब न मीठा इल्म मुझ को दे गया
मैं जड़ों को सींचता था वो गुलों को ले गया
चार दिन की चाँदनी है फिर अँधेरी रात है
आज मैं ख़ुश था बड़ा उपदेश मुझ को दे गया
आसमाँ से गिर रहा था इक सितारा टूट कर
मैं निहारूॅं आसमाँ को वो दुआ तक ले गया
ज़ख़्म पे छिड़के नमक वो ज़ख़्म ताज़ा जब दिखे
ज़ख़्म सूखा जब दिखा तो और चोटें दे गया
दूध के भी दाँत टूटे अब तलक उस के नहीं
वो बना है राजनेता बाप बस कह के गया
साँप छाती पर थे लोटे कामयाबी देख कर
जो उठा है वो गिरेगा मुझ को भाषण दे गया
मैं समा जाता ज़मीं पर जब भी की ग़लती कभी
वो ग़ज़ल मेरी चुरा छाती फुला कर के गया
दाल होती घर की मुर्गी ये बताऊँ मैं किसे
रोज़ ख़ुद वो घर की बीवी छोड़ कोठे पे गया
अंत होगा जो भला तो सब भला होता नहीं
जीत कर अर्जुन महाभारत दुखी मन से गया















