काश ऐसा होता
वादियों का आँचल हो सामने घना वन हो
बारिशों का मौसम हो धुन हवा की सन-सन हो
झूमती फ़ज़ाएँ हों साथ में मिरे तू हो
गिर रही फुहारें हो भीगता हुआ तन हो
इक नशा सा छा जाए हम उड़ें गगन में यूँ
छोड़ कर जहाँ पीछे भूलना ये जीवन हो
रास्ता भुला दें हम मंज़िलें भी गुम जाए
बादलों भरा नभ हो सामने भी गुलशन हो
और समाँ महकता हो मोगरे के फूलों से
साथ में तिरी ख़ुशबू खींचती मिरा मन हो
सामने दिखे मंदिर और हम ठहर जाते
रोज़ पूजता तुझ को जैसे तू ही दर्शन हो
— arjun chamoli















