ज़िन्दगी अनजान डर से सहम जाती है मेरी
सोच हर दर-पेश इस दिल को सताती है मेरी
हर सबब है ख़ौफ़ का आग़ाज़ करता रोज़ ही
फ़िक्र मुश्त-ए-ख़ाक हो वो भी डराती है मेरी
उम्र बीती काज छूटा मैं किनारे पर खड़ा
याद कश्ती के मुसाफ़िर की बुलाती है मेरी
ख़ूँ-पसीना सींचकर पाला सभी को नाज़ से
अपनी ही औलाद अब उल्टा सुनाती है मेरी
मैं करूँ परवाह जिनकी वो न जाने प्यार को
मर गए अरमान सब उम्मीद जाती है मेरी
मैं बड़ा किरदार था सबकी कहानी में कभी
आज दर्शक बन गया हूँ जाँ लजाती है मिरी
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