मुझ को मालूम है ये जान से जाना है मुझे
तू मुहब्बत है मिरी जान निभाना है मुझे
देख कर के तुझे पलकें ये झपकती ही नहीं
तुझ से मिल कर कभी इक दिन ये दिखाना है मुझे
आरज़ू है मिरी सूरत पे तिरी लिक्खूँ ग़ज़ल
मसअला ये है तिरा नाम छिपाना है मुझे
यूँ तो पैसे भी कमाने के बहुत से हैं हुनर
शा'इरी कर के फ़क़त नाम कमाना है मुझे
कोई अश'आर जो मारूँ तो वो जा दिल पे लगे
अब कि शाइ'र से वो फ़न सीख के आना है मुझे
सुब्ह गिर जाता है अक्सर किसी तालाब में वो
मिल के सूरज से उसे चलना सिखाना है मुझे
डूब जाते हैं जो आँखों में ही लैला के किसी
ऐसे मजनून को तैराकी सिखाना है मुझे
— Arman Habib















