है उन को नफ़रत भी मुस्लिमों से मगर वो शेख़ों से मिल रहे हैं

ये कैसी रिश्तों की दास्ताँ है ये इश्क़-ओ-फ़ितरत नहीं चलेगी

जला के घर को ग़रीब की तुम अगर जो सेंकोगे रोटियाँ फिर
ज़ियादा दिन तक समझ लो हाकिम यहाँ हुकूमत नहीं चलेगी

— Arman Habib

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