'ishq ki yuñ bhi mudaarat hui jaati hai | 'इश्क़ की यूँँ भी मुदारात हुई जाती है

  - A R Sahil "Aleeg"

'इश्क़ की यूँँ भी मुदारात हुई जाती है
ख़्वाब में उन सेे मुलाक़ात हुई जाती है

पास आने में तक़ल्लुफ़ है उन्हें हाँ लेकिन
आँखों आँखों में ख़ुराफ़ात हुई जाती है

एक तो सर को मुयस्सर ही नहीं कोई छत
और सितम उस पे कि बरसात हुई जाती है


जिस तरफ ज़हर है जाने को मचलती है ये

ज़िंदगी अपनी भी सुकरात हुई जाती है
जैसा दिखता है बताती है उसे वैसा ही

मेरी आदत भी ये मिरआत हुई जाती है
आप क़दमों में बिछाएँगे सितारे सारे

छोटा मुँह और बड़ी बात हुई जाती है
पहले तो शिकवा भी था उन सेे सितम ढाने का

अब ये दिल के लिए सौग़ात हुई जाती है
क़ब्र में सिर्फ़ बदन होते नहीं दफ़्न यहाँ

ख़ाक़ हर शख़्स की औक़ात हुई जाती है
एक मक़्ता ही तो है दोस्त ग़ज़ल का साहिल

सुब्ह से जिसके लिए रात हुई जाती है

  - A R Sahil "Aleeg"

Ulfat Shayari

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