“जंग”
जब राइफ़लें नहीं गाएँगी लोरियाँ
और बारूद की महक को
बच्चे इत्र समझ कर नहीं सूँघेंगे
जब हर घर में दीवारों की जगह
दरवाज़े होंगे खुले हुए
तो समझ लेना
जंग थक चुकी होगी
जब खूँख़ार हुकूमतें
किसी खेत की मेड़ पर बैठ कर
फ़सलें उगाने लगेंगी
और टैंकों की जगह
कुआँ खोदने वाले औज़ार बाँटेंगी
तो समझ लेना
सियासत भी शर्मिंदा हो चली होगी
जब शे'र कहने वाले
ज़ख़्मों की गिनती नहीं करेंगे
बल्कि मुहब्बत की बारिशों को
बाँधने लगेंगे मतले में
और कोई बच्चा
बम की जगह काग़ज़ की नाव बनाएगा
तो समझ लेना
इंसानियत लौट आई होगी
और हाँ
जब एक शाम
सीमा की दो ओर बैठे सिपाही
एक ही सूरज को देख कर कहेंगे
चलो घर चलते हैं
तो उस दिन
जंग वाक़ई ख़त्म हो चुकी होगी















