सभी शाइ'र अभी शामिल किराए पर
सजी है आज की महफ़िल किराए पर
मिरी सुन कर मुझे सूली चढ़ा देंगे
की हैं मैं ने ग़ज़ल हासिल किराए पर
ख़ुशी ये है कि आशिक़ मिल गया लेकिन
कसक है ये नहीं है दिल किराए पर
मुझे इस मुल्क में नफ़रत बढ़ानी है
बनोगे क्या मेरे क़ातिल किराए पर
चलीं नदियाँ समुंदर से गले लगने
मिला उन को नहीं साहिल किराए पर
किसी क़ीमत भी आँखें बेचकर अपनी
वो लड़की चाहती है तिल किराए पर
झरोखा मिल गया है इक किराए का
ख़ुदा दे दे मह-ए-कामिल किराए पर
किराया दो तो हिन्दू भी बनूँगा मैं
अज़ाँ में भी हुआ शामिल किराए पर
मिली है ज़िंदगी वो भी किराए की
उसे भी दो कोई बिस्मिल किराए पर
— Prabhat Adhar















