तस्वीर भी बनाई लिखा है कभी कभी
कितना तुझे है चाहा सज़ा है कभी कभी
ख़ुद्दार भी नहीं मैं तुझे भूल जाऊँ और
ये याद है तिरी या फ़ज़ा है कभी कभी
तू जिस्म है कहीं है कहीं रूह इस तरह
मेरी नज़र से देख ख़ुदा है कभी कभी
शायद मिरा नसीब नहीं तुझ सा फिर मिले
सारे जहाँ में ढूँढा जफ़ा है कभी कभी
इतनी है दूरी जो मिरी जाँ किस तरह हो कम
क़ुर्बत तिरी क़ुबूल दु'आ है कभी कभी
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