
उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ
कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ
मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक
कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
— Ashraf Jahangeer
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