उस की क़ुर्बत में हुआ है ये ख़सारा मेरा
आप पढ़ लीजिए हर आँख में क़िस्सा मेरा
हर नई साँस पे बनता हूँ बिगड़ जाता हूँ
ये हवा ख़त्म ही कर दे न तमाशा मेरा
अब तो होंटों पे कभी फूल भी खिल जाते हैं
आप ने इन दिनों देखा नहीं चेहरा मेरा
मैं ने रो रो के उसे ग़ैर का होने न दिया
उस बला-ख़ेज़ को ज़ंजीर था गिर्या मेरा
अब नए दश्त मुझे देख के डर जाते हैं
मेरी वहशत ने बढ़ा रक्खा है रुत्बा मेरा
— Ashu Mishra















