इस से क्या बढ़ के बद-नसीबी हो
एक शाइ'र जो फ़लसफ़ी भी हो
एक मंज़र हो शांत ठहरा हुआ
जिस में बहती हुई नदी भी हो
इक मोहब्बत मुझे भी है दरकार
जो कि पहली हो आख़िरी भी हो
इक कहानी है मेरे बारे में
तुम ने शायद कहीं सुनी भी हो
याद वो शय है जिस के मरने पर
दिल में मातम भी हो ख़ुशी भी हो
क्या ख़बर उस के दूर जाने का
इक सबब मेरी ख़ामुशी भी हो
— Ashu Mishra















